Sunday, November 7, 2010

रिश्तों की परिभाषा

            
 रिश्तों की परिभाषा

रिश्तों की सच्ची परिभाषा , हम तब जीवन में लाते
पैदा होते ही मिल जाते , जब ढेरों रिश्ते-नाते

रिश्ते होते सुख के - दुख के ,पीर बॉंटते - पीर मानते
एक सुनी आवाज कहीं तो ,छोड़ हाथ का काम भागते

जात न होती ,पांत न होती , छोटे -बड़े का भेद न होता
न को ऊँचा ,न कोई नीचा , कहीं क्षमा कहीं खेद न होता 

कोई रोक न होती टोक न होती ,दिल ही कहता दिल ही सुनता
न कोई लम्हा दुख का होता , न मिलना और बिछड़ना होता

ऐसे पल जब हमको मिलते , तब ही सच्चा जीवन होता
न सुख तेरा न दुख मेरा , न बंधन इसका-उसका होता 

रिश्तों की इस परिभाषा को  , हम तब ही खुद में पाते
जब हम रिश्तों में और रिश्ते , हम में आकर बॅंध जाते

12 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...रिश्तों में बंध कर हर रिश्ते को निबाहना भी आना चाहिए

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  2. रिश्तों के बारे में बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति|

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  3. आपका स्वागत है, रिश्ते दर्पण की तरह होते हैं इनमे हम अपनी ही तस्वीर दिखती है, तो जो निभा ले वह भरा है जो नहीं निभा पाता वह अभी खुद ही तलाश रहा है,सुंदर रचना के लिये बधाई!

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  4. सुन्दर परिभाशा है। शुभकामनायें।

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  5. सुंदर रचना, साधुवाद...

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  6. आप सभी का हार्दिक अभिनंदन और दीपावली की शुभकामनाएं

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  7. सही है ये जो ढेर सारे रिश्ते मिलते है वे सब झूंठे है रिश्ता तो सच्चा वही है सुख दुख पीडा का । जब हम रिश्तो में और रिश्ते हम में बंध जाते है इस बात ने रचना को बहुत ही सार्थक बना दिया है। कही से पीडा की आवाज सुनते ही हाथ का काम छोड कर उसकी मदद को जाते मानव जीवन का लक्ष्य बताती रचना

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  8. सही कहा आपने - जब रिश्तों में नए रिश्तों में बंध जाते हैं तो हम खुद भी बंध जाते हैं ...शुभकामना

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  9. रिश्तों की इस परिभाषा को , हम तब ही खुद में पाते
    जब हम रिश्तों में और रिश्ते , हम में आकर बॅंध जाते
    ...पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ पर सशक्त अभिव्यक्ति...बधाई.


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    'शब्द-शिखर' पर पढ़िए भारत की प्रथम महिला बैरिस्टर के बारे में...

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  10. वाह...क्या भाव हैं और क्या अभिव्यक्ति...

    मनमोहक अतिसुन्दर रचना...

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