क्षणिकाएँ
खामोश रात के आँचल में गर सितारे ना होते
आसमान में पर चाँद के खूबसूरत नज़ारे ना होते
बरबाद रह जाता जिंदगी का सफर अगर
आप इस सफर में हमारे ना होते !
खामोशी भी कुछ कहती है
खामोशी की भी जुबान होती है
सुनते हैं हम अपनी धडकनें ही खामोशी में
और जब धडकनें ही खामोश हो जाए तब ?
खामोशी ही खामोशी तब रहती है !
कब दिन ढला , कब शाम ढली
जब रात हुई तब सोचा किए
वो कौन था जिसकी याद में
हम कभी रोया किए कभी तड़पा किए
अनंत आकाश में उड़ते हुए स्वछंद पंछियों के झुंड में शामिल एक नया पंछी .....जो अनुभूति रखता है इंसानियत के ,मानवता के मूल्यों की ,जो न सिर्फ कागज पर उतारता है ......अपने और दूसरों के भावों को ,दर्दों को बल्कि रंगों की दुनिया में ले जाता है उन भावनाओं को और चित्रित भी करता है !
Wednesday, July 13, 2011
Wednesday, June 22, 2011
नव संदेश
वृक्षों ने फुनगी पर अपने
टाँग दिए हैं नव संदेश
तू जाग - जाग, ऐ मेरे देश ।
कहाँ गईं? सो गईं बहारें
देखो धरती में पडी दरारें
सो जाए कहीं न ये कलरव
खो जाए कहीं न ये पराग
तू जाग - जाग , ऐ मेरे देश।
क्यों नहीं सोचता यह मानव?
क्या शेष नहीं कुछ मानवता?
जब हम ही नहीं तो इस जीवन का
कुछ मोल भला फिर हो सकता?
न हमें भुला
तू हमें जिला
फैला दे जन-जन में संदेश
ऐ मेरे देश
ऐ मेरे देश
तू जाग - जाग ऐ मेरे देश ।
तू अरे जाग! ऐ मेरे देश ।
Saturday, May 21, 2011
बारिश की सुबह
बारिश की एक सुबह सुहानी
इंद्रधनुष बैठा सुस्ताते
सोच रहा था आँख मूंद कर
सूरज दादा क्यों नहीं आते ?
सूरज दादा जब आएँगें
तब ही तो मैं गाऊँगा
झूम उठेंगे नन्हें बच्चे
जब मैं नभ पर छाऊँगा ।
बादल की चादर को ताने
सूरज दादा थे अलसाए
सोच रहे थे इस मौसम में
क्यों न छुट्टी आज मनाएँ ।
तभी हवा के झौंके आए
बादल इधर-उधर छितराए
सूरज दादा फैंक के चादर
ले अंगड़ाई बाहर आए ।
बाहर आकर आसमान को
देख के हौले से मुस्काए
इंद्रधनुष भी लगा चमकने
सारे बच्चे खुश हो आए
झट ले अपनी पतंग और चरखी
आसमान को रंगने आए ।
Saturday, May 14, 2011
सपनों की पतंग
आओ बच्चों तुम्हें सिखाएं
हम ऐसी एक पतंग बनाएं
सपनों का कागज हो जिसमें
अरमानों की डोर लगाएं
देख हवा का रूख चुपके से
बैठ पतंग पर खुद उड़ जाएं
आसमान पर उत्तर में है
चमकीला मनमोहक ध्रुव तारा
वहीं चांद पे बैठी नानी
देख रही होगी जग सारा ।
हम मामा के स्रंग बादल पर
आसमान की सैर करेंगें
मालपुए जो मामी देगीं
उनसे अपना पेट भरेंगें ।
नानी का चरखा कातेंगें
और सुनेंगें खूब कहानी
याद नहीं क्या आती सबकी
पूछेंगें , बतलाओ नानी ?
बिजली की शक्ति जानेंगें
बादल में पानी खोजेंगें
चंदा मामा से शीतलता
नानी से हम तकली लेंगें ।
अरमानों की डोर में सबको
बांध धरा पर ले आएंगें
मामा-मामी , नानी सबकी
बात सभी को बतलाएंगें ।
जो भी बच्चा जब भी चाहे
अरमानों की डोर सजाए
सपनों की एक पतंग बना कर
आसमान में झट उड़ जाए ।
Wednesday, January 12, 2011
कैसे आता है वसंत ?
कलियों के खिल जाने से
भौरों के गुन-गुन गाने से
और तितली के मंडराने से
फूलों में छाता है वसंत
सूरज की दिशा बदलने से
तिल-गुड़ का भोग लगाने से
और खिचड़ी पर्व मनाने से
बागों में गाता है वसंत
नव-गीत हवा के गाने से
किरणों के नभ पर छाने से
पंछी के पर फैलाने से
बन पतंग फहराता है वसंत
आमों में बौरें आने से
कोयल के कुहु-कुहु गाने से
और सरसों के लहराने से
मन को भरमाता है वसंत
पत्तों की सूखी कुटिया में
मोती सी चमकती बूंदों में
कोरों पर ठहरी शबनम में
भोले बचपन की आंखों में
नन्हें पैरों की छापों में
निश्छल भोली मुस्कानों में
गालों के गड्ढों में हॅंसकर
घुंघराले बालों में फॅंसकर
दलियानों में, खलियानों में
धूल भरी पगडंडी में
हौले से चलता-चलता
चोखट पर आता है वसंत
धरती पर गाता है वसंत
मन को पगलाता है वसंत
जग में छा जाता है वसंत
सच बोलो तो....
ऐसे आता है वसंत !
ऐसे आता है वसंत !
Saturday, January 1, 2011
Saturday, December 11, 2010
क्षितिज
क्षितिज
जब धरा बढ़ी और गगन मिला
तब क्षितिज बना
क्षितिज अनंत और विशाल
इसका कोई ओर नहीं , कोई छोर नहीं
पर है गहन अस्तित्व
हर सुबह सूर्य वहीं से उगता है
और शाम ढले चांद समंदर के आगोश से
मुस्कुराता हुआ उठता है
आसमान से पंक्षी उड़ते हुए आते हैं और क्षितिज को छूते हुए
जाने कौन देश पहुँच जाते है
संसार को चलायमान होने का नाम क्षितिज है
धरा , गगन और पाताल होने का नाम क्षितिज है ।
.
Friday, December 3, 2010
Saturday, November 27, 2010
Wednesday, November 24, 2010
पल और कल
पल और कल
आग लगा दो तन के उपर
तन का क्या है जल जाएगा
लेकिन दिल का दर्द तो दिल के
भीतर दिल में रह जाएगा !
कसम दिला दो सिर की अपनी
ओंठ के उपर ताला जड दो
लेकिन फिर भी आंख का पानी
जो कहना है कह जाएगा !
चुनवा दो कितनी दीवारें
हाथ-पांव में बेडी जड दो
लेकिन सच्चे दिल का फिर भी
ताजमहल न ढह पाएगा !
आज मिला जो मानव जीवन
बेशकीमती , बात मान लो
लम्हा-लम्हा जी लो पल का
आज गया न कल आएगा !
Sunday, November 7, 2010
रिश्तों की परिभाषा
रिश्तों की परिभाषा
रिश्तों की सच्ची परिभाषा , हम तब जीवन में लाते
पैदा होते ही मिल जाते , जब ढेरों रिश्ते-नाते
रिश्ते होते सुख के - दुख के ,पीर बॉंटते - पीर मानते
एक सुनी आवाज कहीं तो ,छोड़ हाथ का काम भागते
जात न होती ,पांत न होती , छोटे -बड़े का भेद न होता
न को ऊँचा ,न कोई नीचा , कहीं क्षमा कहीं खेद न होता
कोई रोक न होती टोक न होती ,दिल ही कहता दिल ही सुनता
न कोई लम्हा दुख का होता , न मिलना और बिछड़ना होता
ऐसे पल जब हमको मिलते , तब ही सच्चा जीवन होता
न सुख तेरा न दुख मेरा , न बंधन इसका-उसका होता
रिश्तों की इस परिभाषा को , हम तब ही खुद में पाते
जब हम रिश्तों में और रिश्ते , हम में आकर बॅंध जाते
Friday, August 27, 2010
दोस्ती कागज और कलम की
दोस्ती कागज और कलम से करो
अपने जज्.बात बयां कागज पर कलम से करो ।
गैरौं से शिकवा ,अपनों से शिकायत
किसी से धोखा , अपनों से मोहब्बत
जुबां से नहीं , बयां कागज पर , कलम से करो ।
जब जुबां न दे साथ तो उसे साकार
कागज पर कलम से करो ।
सुनो सबकी ,
देखो सब कुछ
पर दिल की बात बताओ न किसी को
जग बेगाना है
राई का पहाड. बना देता है
अपना है तो बस कागज और कलम
चाहे उस पर कितना भी लिखो , कुछ भी लिखो
चाहे लिखो आँसू में भीगे अतीत को
खून से रिसते रिश्तों को
ये किसी को कुछ भी बताता भी नहीं
मत रोको अपने जज्.बातों को
मत बनने दो भावनाओं का कैंसर
अक्षरों की शक्ल में
बहने दो भावों की निर्मल नदी को
निरंतर , निरंतर और निरंतर ।
इस जिंदगी के सफेद कागज पर
उकेर दो
अपना अतीत , अपना वर्तमान ,अपना भविष्य
कल से डर कैसा ?
जब तुम नहीं तो तुम्हारी
हकीकत तो रहेगी ही ,जीते जी न सही
मर कर ही सही सामने तो आएगी !..
Thursday, August 19, 2010
पहला दीपक
गौधूलि की बेला में
जब
पहला दीपक जलता है
धड.कन हो जातीं क्यों बेकाबू
मन कहीं और
मचलता है ।
वो हाथ कहाँ
जिनसे पोंछूँ
मैं बहती आँखों के आँसू
वो बात कहाँ?
वो रात कहाँ?
बस तिल - तिल
मुरझाए गेसू ।
Saturday, August 7, 2010
चुप का ताला
सबके सामने
मैं सूली पर चढा था ,
कुछ कह रहीं थीं तुम्हारी आँखें
पर
तुम्हारे ओंठों पर
चुप का
ताला पडा था!
.
Friday, August 6, 2010
शब्दों का कराहना
मेरी रगों में
खून नहीं
शब्द बहते हैं
मेरे दिल में कुरान की आयतें
गीता के उपदेश
रामायण की चोपाइयां
बाइबिल के उपदेश
बना लिए हैं अपना घर
मुझे पत्थर से चोट नहीं लगती
शब्द ही शब्दों को मारते हैं
और कराहते हैं
उम्र भर
इनका कोई
मरहम भी तो नहीं ।
Tuesday, July 27, 2010
मेरी माँ
मेरी माँ
छोटा सा एक नन्हा बच्चा
छत पर बैठा सोच रहा था
काश कहीं जो मैं उड़ पाऊँ
या फिर ऐसी पतंग बनाऊँ
आसमान से तुझको लाने
बैठ पतंग पर मैं उड़ जाऊँ ।
सब कहते हैं तुम ऊपर हो
इंद्रधनुष में या बादल में ?
चंदा के घर या तारों में ?
बोलो तुमको कैसें पाऊँ ?
मुझको नीचे छोड़ गईं क्यों ?
तुम चंदा के ठौर गईं क्यों ?
याद नहीं क्या आती मेरी ?
आँखें नम न होती तेरीं ?
या तू मुझको साथ में लाती
मुझको धरती जरा न भाती
तेरी चिट्टी न कोई पाती
तू क्यों ऐसे मुझे रूलाती ?
आज पतंग पर मैं आऊँगा
अगर वहाँ तुझको पाऊँगा
सच कहता हूँ मेरी माँ मैं
बाँध पतंग में ले लाऊँगा ।
मैं तेरा नन्हा सा बेटा
आज यहाँ पर गुम-सुम बैठा
सोच रहा एक पतंग बनाऊँ
आसमान पर मैं उड़ जाऊँ
और अगर तुझको पा जाऊँ
तुझे धरा पर वापस लाऊँ ।
The Girl with the Dragon Tattoo
छोटा सा एक नन्हा बच्चा
छत पर बैठा सोच रहा था
काश कहीं जो मैं उड़ पाऊँ
या फिर ऐसी पतंग बनाऊँ
आसमान से तुझको लाने
बैठ पतंग पर मैं उड़ जाऊँ ।
सब कहते हैं तुम ऊपर हो
इंद्रधनुष में या बादल में ?
चंदा के घर या तारों में ?
बोलो तुमको कैसें पाऊँ ?
मुझको नीचे छोड़ गईं क्यों ?
तुम चंदा के ठौर गईं क्यों ?
याद नहीं क्या आती मेरी ?
आँखें नम न होती तेरीं ?
या तू मुझको साथ में लाती
मुझको धरती जरा न भाती
तेरी चिट्टी न कोई पाती
तू क्यों ऐसे मुझे रूलाती ?
आज पतंग पर मैं आऊँगा
अगर वहाँ तुझको पाऊँगा
सच कहता हूँ मेरी माँ मैं
बाँध पतंग में ले लाऊँगा ।
मैं तेरा नन्हा सा बेटा
आज यहाँ पर गुम-सुम बैठा
सोच रहा एक पतंग बनाऊँ
आसमान पर मैं उड़ जाऊँ
और अगर तुझको पा जाऊँ
तुझे धरा पर वापस लाऊँ ।
Friday, June 11, 2010
तन्हा सफर
मैं सफर में थी
ऐसा नहीं कि मैंने तुम्हें याद न किया
तुम्हें खत न लिखे
मगर वो हवाएं न थीं
जो मेरी सांसों को उड़ा ले जातीं
वो हरकारा न था
जो मेरे खतों को तुम तक पहुंचाता
हर पल.हर क्षण
हर पत्ते .फूल और कण.कण में
तपती धूप और जलते पानी से
बनते बादल में छुपे सूरज में
सुनसान अंधेरे बियाबान , जंगल .पहाड़ों में
मैं हैरान थी
मैं सफर में थी
पर तुमसे दूर नहीं
शायद निगाहों से
पर मन से नहीं ।
Tuesday, January 5, 2010
ठहरा हुआ पानी

ठहरा हुआ पानी
ठहरे हुए पानी में हर चीज ठहर जाती है
ठहरे हुए पानी में परछाईं नज़र आती है !
ठहरे हुए पानी में वो चाँद नज़र आता है
तन्हाई से घबरा के जो पानी में छुप जाता है !
कभी-कभी मिलता है पल भर के लिए कोई हमें
पर उसकी याद हमें उम्र भर रह जाती है !
कौन किसकी याद में वेचैन रहा तमाम उम्र
यह बात उसके चेहरे की झुर्रियाँ कह जाती हैं !
राहे जिन्दगी कितनी मुश्किल से कट रही होगी
हाथ में फैली हुई सैकड़ों पगडंडियाँ बतलाती हैं !
चाँद के न होने का क्यों रात से हम शिकवा करें
बस एक सितारा भी हो तो रात हँस के गुजर जाती है !
थामे हुए पानी को कोई छुता नहीं ,पीता नहीं
कमबख्त कुमुदिनी वहां शान से मुस्काती है !
हम चाहते हैं कि आप हमें रुखसत करें रुसवा नहीं
वरना क्या है कि जिन्दगी एक दास्ताँ बन जाती है !
ठहरे हुए पानी में हर चीज ठहर जाती है
ठहरे हुए पानी में परछाईं नज़र आती है !
Wednesday, December 16, 2009
याद तुम्हारी

चाहे कोई मौसम आये
चाहे कोई मौसम जाये
कैसी अद्भुत याद तुम्हारी
हर मौसम के साथ सताए
नीला अम्बर जब मुस्काए
सोंधी मिटटी खुशबु बन कर
संग गीत हवाओं के गाये
धानी चूनर ओढ़ धरा ले
कहीं दूर कोई ,बिरहा गाये
मेरा मन तब घुमड़-घुमड़ कर तुमको ही सुनना चाहे
चाहे कोई मौसम आये
चाहे कोई मौसम जाये
कैसी अद्भुत याद तुम्हारी
हर मौसम के साथ सताए
रात शरद की चाँद दूज का
छितराए काले बादल में
खुली अलक में , नम पलक में
आँखों के काले काजल में
बिछे धरा पे हरश्रृंगार में
दहके जलते हुए पलाश में
झर-झर झरते अमलताश में
पतझड़ के पत्तों सा नाजुक
मन दीवाना कटी पतंग सा
तुमको छूने , तुमको पाने साथ समय के उड़ता जाये
चाहे कोई मौसम आये
चाहे कोई मौसम जाये
कैसी अद्भुत याद तुम्हारी
हर मौसम के साथ सताए
Subscribe to:
Posts (Atom)






