अनंत आकाश में उड़ते हुए स्वछंद पंछियों के झुंड में शामिल एक नया पंछी .....जो अनुभूति रखता है इंसानियत के ,मानवता के मूल्यों की ,जो न सिर्फ कागज पर उतारता है ......अपने और दूसरों के भावों को ,दर्दों को बल्कि रंगों की दुनिया में ले जाता है उन भावनाओं को और चित्रित भी करता है !
Tuesday, January 8, 2013
Tuesday, November 27, 2012
Sunday, November 25, 2012
Sunday, November 11, 2012
Saturday, November 3, 2012
बहारें फिर से आयेगीं
शाम हुई हम धीरे-धीरे
चले नदी के तीरे-तीरे
आसमान के माथे देखो
कितनी गहरी पड़ीं लकीरें
पेड़ का पीला पाखर देखा
हमने हँस कर उस से पूछा
क्यूँ तुम इतने पीले-पीले
नैन तुम्हारे गीले-गीले
विदा बिछड़ने की अब आई
मौसम ने ले ली अंगडाई
साथ है छूटा अब उड़ लेगें
संग हवा के हम बिख्ररेगें
हवा तुनक गई बोली मैं तो
काम हूँ हरकारे का करती
दिन भर उडती ले कर तुमको
कभी यहाँ कभी वहां हूँ धरती
यही सृष्टि की रीत निराली
आज हुई जो खाली डाली
नए पात आएँगें उस पर
छाएगी उस पर खुशहाली
Tuesday, October 30, 2012
जरुरी तो नहीं
तुम साथ चलो मेरे
और बात करो मुझसे
यह जरुरी तो नहीं
तुम बात करो मुझसे
और साथ चलो मेरे
यह जरुरी तो नहीं
जो घाटियों में गूंजें
वो गीत हो हमारे
यह जरुरी तो नहीं
जो गीत हों हमारे
वो घाटियों में गूंजें
यह जरुरी तो नहीं
जो बात हो जुबान पर
वही बात बसे दिल में
यह जरूरी तो नहीं
और जो बात बसे दिल में
वही बात हो जुबान पर
यह जरूरी तो नहीं
Saturday, October 20, 2012
एक शाम
कल
मुझको पगडण्डी पर
चलते
एक
शाम मिली जो
तन्हा थी
वो
तन्हा थी मैं
थी तन्हा
वो
मुस्काई
मैं
मुस्काई
वो
मुस्काई
बस
! मौन हमारी भाषा
थी
हवा
थम गई , भूल
के बहना
लगी
कान में सबके
कहना
एक
शाम कुछ भटक
गई है
पगडंडी
पर अटक गई
है
क्यूँ
तन्हा तुम मैनें
पूछा ?
क्यूँ
तन्हा तुम उसने
पूछा ?
गम
मुझे कहीं था
सपनों का
गम
उसे कहीं था
अपनों का
सूरज
के संग दिन
भर भटकी
सांझ
हुई चौखट पर
अटकी
अब
वो मुझसे पूछ
रहा है क्या
मैं जाऊं ?
उसके
माथे के तिनकों
से
बालों
को मैनें सुलझाया
दूबों
के कोरों पर
अटकी शबनम को
हौले
से अंजुल में
भर कर
उसकी
आँखों को धुलवाया
मासूम
कांपते अधरों ने
जब
सूरज को अलविदा
कहा
मेरा
दिल रो कर
बोला
क्यों
तूने इतना दर्द सहा
?
वो
सम्भल गई
बोली
, सुन अपनी उमर
गई
वह
तन्हा थी , मैं
थी तन्हा
पर
नहीं अभी हम
तन्हा थे
हम
एक राह के
राही थे
हम
तन्हाई के साथी
थे
Thursday, October 18, 2012
Wednesday, August 15, 2012
ठहरा हुआ पानी
ठहरे हुए पानी में , हर चीज ठहर जाती है
ठहरे हुए पानी में , परछाईँ नजर आती है !
ठहरे हुए पानी में , वो चाँद नजर आता है
तन्हाई से घबरा कर , जो पानीमें छुप जाता है !
कभी कभी मिलता है , पल भर के लिए कोई हमें
पर उसकी याद हमें , उम्र भर रह जाती है !
चाँद के ना होने का , क्यों रात से हम शिकवा करें
बस एक सितारा भी हो , तो रात हँस के गुजर जाती है !
Friday, April 13, 2012
आसमान की सैर
आओ बच्चो तुम्हें सिखाएं
हम एक ऐसी पतंग बनाएं
सपनों का कागज हो उसमें
अरमानों की डोर लगाएँ
देख हवा का रुख , चुपके से
बैठ पतंग पर खुद उड़ जाएँ !
आसमान पर उत्तर में है
चमकीला मोहक ध्रुब तारा
वहीं चाँद के अंदर बैठी
नानी देख रही जग सारा
हम मामा के संग बादल पर
आसमान की सैर करेगें
मालपुए जो मामी देगीं
उनसे अपना पेट भरेगें
नानी का चरखा कातेगें
और सुनेगें खूब कहानी
याद नहीं क्या आती सबकी
पूछेगें , बतलाओ नानी ?
बिजली की शक्ति जानेगें
बादल में पानी खोजेगें
चंदा मामा से शीतलता
नानी से तकली हम लेगें
अरमानों की डोर में सबको
बाँध धरा पर ले आएँगें
मामा-मामी , नानी सबकी
बात सभी को बतलाएँगें
जो भी बच्चा , जब भी चाहे
अरमानों की डोर लगाए
सपनों की एक पतंग बना कर
आसमान में झट उड़ जाए !
Wednesday, February 29, 2012
आओ भुला दें
आओ भुला दें गुजरी बातें , गुजरे लम्हे , गुजरे पल
तेज हवा में चिंदी-चिंदी हो कर उड़ गये गुजरे कल
लम्हा-लम्हा जी लो जीवन , समय पलट न आएगा
सुबह उगा जो तपता सूरज , शाम हुए जाता है ढल !
पी लो अपनी आँख का आँसू , मोती बन कर टपकेगा
अगर जो छलका ,वहां फलक पर इन्द्रधनुष बन चमकेगा
कभी दुखों के बादल छायें , घबरा कर न रुक जाना
सुख का चंदा गहन रात में आसमान पर दमकेगा !
Saturday, January 14, 2012
पौष मेला
आओ बच्चों तुम्हें घुमाएँ
आसमान की सैर कराएँ
यहाँ चमकते बिजली जैसे
कनकौए से तुम्हें मिलाएं !
आज यहाँ पर पंछी जैसी
ढेर पतंगें डोल रही हैं
लहराती - बलखाती कितने
रंग फिजां में घोल रही हैं !
तुम सोचोगे बात हुई क्या
क्यों डोले हैं ये मतवाली ?
इन्द्रधनुष सी सात रंग की
बजा-बजा नभ में ताली !
तब तुम जानों आज धरा से
ये पौष मनाने आई हैं
रंग-बिरंगे परिधानों में
इन्द्रधनुष सी छाई हैं !
सोने जैसी चम-चम करतीं
चाँदी जैसी चमकीली
पलक झपकते नीचे आती
डोर कहीं जो होए ढीली !
संग हवा के उपर-नीचे
दायें-बाएं झट मुड़ जाएँ
आओ हम को छू कर देखो
बात-बात में धौंस दिखाएँ !
कभी लड़ाएं पेंच किसी से
कभी लहराती नीचे आयें
फिर सन्नाती उपर जाकर
मार झपट्टा काट गिराएँ !
सीना तान गर्व से अपना
बांध पुछल्ला है इतराती
वश में नहीं आज वे अपने
लपट-झपट कर उडती जाती !
इत्ता बड़ा आसमाँ फिर भी
आगे-पीछे एक न चलतीं
तितली जैसी फर-फर करतीं
कटती-गिरती फिर से उडती !
कभी पौष तो कभी वसंत में
कभी खिचड़ी तो कभी अनंत में
बांध डोर ये झट उड़ जातीं
हंस कर सब त्यौहार मनाती !
Sunday, November 13, 2011
बादल - पर्वत
मैं बादल
तू पर्वत ही सही
तू लाख करे इंकार मगर
तुझसे मिलने मैं
आऊंगा तो सही
तेरी हरी-भरी वादियों में
छाऊँगा तो कहीं
हर सुबह शबनम बन
तेरी जुल्फों में
मोतियों सा चमकूँगा
तेरे माथे को
हौले से सहलाऊंगा
सरे शाम जब
हवाएं सरसराएंगीं
मुझे साथ लिए आयेंगीं
ठण्ड से कांपेंगीं
और आहिस्ते-आहिस्ते
तेरे आंचल में समा जाएँगी
तब चुपके से
तेरी सांसों को मैं सुनूंगा
तू भी शायद
मेरी धडकनों को गिन सके
मेरी पीर अगर बहेगी
नीर बन कर तो
तेरे अंदर भी तो
दर्द के सोते बहेंगे
मेरे दिल में अगर
बिजली की चमक है तो
तू भी तो लावा
अपने दिल में लिए बैठी है
तू अचल-अडिग
कभी मुंह तो खोल
कुछ तो बोल
न आने दे वो घड़ी कि
तेरे अंदर का लावा दहक उठे और
मेरे अंदर की बिजली कहर ढा
हम दोनों को भस्म कर दे
Sunday, August 14, 2011
पावस गीत
अनजाने मेघों की
परिचित सी दस्तक पर
यादों के तेरे
मैनें
दीप जलाये
न खोलूं किवड़िया
न खिड़की मैं खोलूं
पावस की बदली
पर सन्दों से छन कर
पलकों में मेरी
तेरे
सपने सजाये
आँखों में छलकें
या बूँद बन बरसें
पावस के मोती
मैनें अँजुर में भर कर
प्रीत पगे धागे से
दिल
में टंकाये
अम्बर की आहट पर
धरती की चौखट पर
उडती फुहारों ने
तालबद्ध हो कर
सपनीले सावन के
भीगे मिलन के
चारों दिशाओं में
गीत
मधुर गाये
उनींदी हवाओं ने
पागल घटाओं ने
बिजुरी के झूलों में
ऊँची सी पींग भर
हाथों में हाथ धर
फिर से मिलन के
सभी
वादे निभाए
अनजाने मेघों की
परिचित सी दस्तक पर
यादों के तेरे
मैनें दीप जलाये !
Wednesday, July 13, 2011
क्षणिकाएँ
खामोश रात के आँचल में गर सितारे ना होते
आसमान में पर चाँद के खूबसूरत नज़ारे ना होते
बरबाद रह जाता जिंदगी का सफर अगर
आप इस सफर में हमारे ना होते !
खामोशी भी कुछ कहती है
खामोशी की भी जुबान होती है
सुनते हैं हम अपनी धडकनें ही खामोशी में
और जब धडकनें ही खामोश हो जाए तब ?
खामोशी ही खामोशी तब रहती है !
कब दिन ढला , कब शाम ढली
जब रात हुई तब सोचा किए
वो कौन था जिसकी याद में
हम कभी रोया किए कभी तड़पा किए
खामोश रात के आँचल में गर सितारे ना होते
आसमान में पर चाँद के खूबसूरत नज़ारे ना होते
बरबाद रह जाता जिंदगी का सफर अगर
आप इस सफर में हमारे ना होते !
खामोशी भी कुछ कहती है
खामोशी की भी जुबान होती है
सुनते हैं हम अपनी धडकनें ही खामोशी में
और जब धडकनें ही खामोश हो जाए तब ?
खामोशी ही खामोशी तब रहती है !
कब दिन ढला , कब शाम ढली
जब रात हुई तब सोचा किए
वो कौन था जिसकी याद में
हम कभी रोया किए कभी तड़पा किए
Wednesday, June 22, 2011
नव संदेश
वृक्षों ने फुनगी पर अपने
टाँग दिए हैं नव संदेश
तू जाग - जाग, ऐ मेरे देश ।
कहाँ गईं? सो गईं बहारें
देखो धरती में पडी दरारें
सो जाए कहीं न ये कलरव
खो जाए कहीं न ये पराग
तू जाग - जाग , ऐ मेरे देश।
क्यों नहीं सोचता यह मानव?
क्या शेष नहीं कुछ मानवता?
जब हम ही नहीं तो इस जीवन का
कुछ मोल भला फिर हो सकता?
न हमें भुला
तू हमें जिला
फैला दे जन-जन में संदेश
ऐ मेरे देश
ऐ मेरे देश
तू जाग - जाग ऐ मेरे देश ।
तू अरे जाग! ऐ मेरे देश ।
Saturday, May 21, 2011
बारिश की सुबह
बारिश की एक सुबह सुहानी
इंद्रधनुष बैठा सुस्ताते
सोच रहा था आँख मूंद कर
सूरज दादा क्यों नहीं आते ?
सूरज दादा जब आएँगें
तब ही तो मैं गाऊँगा
झूम उठेंगे नन्हें बच्चे
जब मैं नभ पर छाऊँगा ।
बादल की चादर को ताने
सूरज दादा थे अलसाए
सोच रहे थे इस मौसम में
क्यों न छुट्टी आज मनाएँ ।
तभी हवा के झौंके आए
बादल इधर-उधर छितराए
सूरज दादा फैंक के चादर
ले अंगड़ाई बाहर आए ।
बाहर आकर आसमान को
देख के हौले से मुस्काए
इंद्रधनुष भी लगा चमकने
सारे बच्चे खुश हो आए
झट ले अपनी पतंग और चरखी
आसमान को रंगने आए ।
Saturday, May 14, 2011
सपनों की पतंग
आओ बच्चों तुम्हें सिखाएं
हम ऐसी एक पतंग बनाएं
सपनों का कागज हो जिसमें
अरमानों की डोर लगाएं
देख हवा का रूख चुपके से
बैठ पतंग पर खुद उड़ जाएं
आसमान पर उत्तर में है
चमकीला मनमोहक ध्रुव तारा
वहीं चांद पे बैठी नानी
देख रही होगी जग सारा ।
हम मामा के स्रंग बादल पर
आसमान की सैर करेंगें
मालपुए जो मामी देगीं
उनसे अपना पेट भरेंगें ।
नानी का चरखा कातेंगें
और सुनेंगें खूब कहानी
याद नहीं क्या आती सबकी
पूछेंगें , बतलाओ नानी ?
बिजली की शक्ति जानेंगें
बादल में पानी खोजेंगें
चंदा मामा से शीतलता
नानी से हम तकली लेंगें ।
अरमानों की डोर में सबको
बांध धरा पर ले आएंगें
मामा-मामी , नानी सबकी
बात सभी को बतलाएंगें ।
जो भी बच्चा जब भी चाहे
अरमानों की डोर सजाए
सपनों की एक पतंग बना कर
आसमान में झट उड़ जाए ।
Wednesday, January 12, 2011
कैसे आता है वसंत ?
कलियों के खिल जाने से
भौरों के गुन-गुन गाने से
और तितली के मंडराने से
फूलों में छाता है वसंत
सूरज की दिशा बदलने से
तिल-गुड़ का भोग लगाने से
और खिचड़ी पर्व मनाने से
बागों में गाता है वसंत
नव-गीत हवा के गाने से
किरणों के नभ पर छाने से
पंछी के पर फैलाने से
बन पतंग फहराता है वसंत
आमों में बौरें आने से
कोयल के कुहु-कुहु गाने से
और सरसों के लहराने से
मन को भरमाता है वसंत
पत्तों की सूखी कुटिया में
मोती सी चमकती बूंदों में
कोरों पर ठहरी शबनम में
भोले बचपन की आंखों में
नन्हें पैरों की छापों में
निश्छल भोली मुस्कानों में
गालों के गड्ढों में हॅंसकर
घुंघराले बालों में फॅंसकर
दलियानों में, खलियानों में
धूल भरी पगडंडी में
हौले से चलता-चलता
चोखट पर आता है वसंत
धरती पर गाता है वसंत
मन को पगलाता है वसंत
जग में छा जाता है वसंत
सच बोलो तो....
ऐसे आता है वसंत !
ऐसे आता है वसंत !
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